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Sunday, 18 May 2014

जिंदगी की कश्मकश

क्या पहेली है
कौन समझा है
पागल किया है कितनों को
कितनों ने है होश खोया

हक़ीक़त है
या कोई भयानक सपना
परयों की बात तो छोड़ो
कोई अपना नहीं लगता है अपना

तलाश है जिस चीज़ की वो है कहाँ
क्या है वो, शायद वो भी नहीं है पता
चलते चलते भूल गया हूँ जाना कहा है
बहुत समय से बस घूम रहा हूँ

कशमकश है ये कैसी,
कम्बख़्त ये क्या समय है.
लगता है सब कुछ तो पास है,
फिर भी मन ना जाने क्यों उदास है.

एक भीड़ सी है, इस दुनिया में
सब मग्न हैं अपनी धुन में
मैं भी इनमें से एक हूँ
खोया अपनी दुनिया में

काफ़ी सपने, ढेरों उम्मीदें
और बस एक मैं
काफ़ी अरमान, अनगिनत चाहतें
और कम समय

ठहरना मेरा काम नही
बस चले चला जा रहा हूँ
रास्ते जहा ले जायें इसकी ना फिकर हो
अपना रास्ता बना सकूँ तो मेहर हो

काफ़ी गम हैं
पर लाखों से कम हैं
खुशियाँ भी हैं
फिर भी आखें क्यूँ नम हैं

सब कुछ है अपनाया
हार नही है मानी
इसे मेरा स्वभाव कहो
या ये है रब की मेहरबानी

खुद कम चाहा है
दिया है ज़्यादा
प्यार बाँटा है
मिला है फिर भी आधा

जिस से भी मिला हूँ
खुशी है उसकी चाही
जीवन आख़िर एक कठिन सफ़र है
और हम सब हैं राही


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